Abstract
International Journal of Advance Research in Multidisciplinary, 2026;4(3):137-140
कुमाऊँ की रामलीला और संगीत
Author : डाॅ. पंकज उप्रेती
Abstract
कुमाऊँ अंचल की रामलीला भारतीय लोकनाट्य परम्परा का एक विशिष्ट एवं समृद्ध रूप हैए जिसमें साहित्यए अभिनयए गायन और शास्त्रीय संगीत का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। प्रस्तुत अध्ययन में कुमाऊँ की रामलीला के संगीत पक्ष का विश्लेषण करते हुए उसके गायन में प्रयुक्त विभिन्न शास्त्रीय रागों एवं तालों का अध्ययन किया गया है। रामकथा की प्राचीन साहित्यिक परम्परा से विकसित कुमाऊँ की रामलीला ने स्थानीय सांस्कृतिक परिवेश के साथ.साथ शास्त्रीय संगीत की परम्पराओं को भी आत्मसात किया है। रामलीला के विभिन्न प्रसंगों में यमनए यमन कल्याणए भैरवीए खमाजए गाराए मांडए झिंझोटीए विहाग तथा जयजयवन्ती आदि रागों का प्रयोग भावानुकूल वातावरण निर्मित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसी प्रकार कहरवाए दीपचन्दीए जततालए दादराए धुमालीए रूपकए तीनताल और झपताल आदि तालों का प्रयोग गीतों एवं संवादों को लयात्मकता प्रदान करता है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि कुमाऊँ की रामलीला में राग और ताल केवल संगीतात्मक सौन्दर्य के साधन नहीं हैंए बल्कि पात्रों की मनोदशाए प्रसंग की संवेदना तथा कथा के भावों को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करने के माध्यम भी हैं। शास्त्रीय संगीत के सिद्धान्तों और लोकगायन की सहज अभिव्यक्ति के समन्वय ने कुमाऊँ की रामलीला को विशिष्ट संगीतात्मक पहचान प्रदान की है। इस प्रकार कुमाऊँ की रामलीला भारतीय लोक एवं शास्त्रीय संगीत परम्पराओं के जीवंत समन्वय का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
Keywords
कुमाऊँ की रामलीला, रामकाव्य रामकथा, लोकनाट्य, शास्त्रीय संगीत, राग ताल, लोकगायन, यमन कल्याण