Abstract
International Journal of Advance Research in Multidisciplinary, 2025;3(2):545-547
भारतीय ज्ञान परंपरा: सत्ता और वर्चस्व
Author : डॉ. संतोष कुमार सिंह
Abstract
यह शोधपत्र भारतीय ज्ञान परंपरा को सत्ता और वर्चस्व के विमर्श से पृथक करते हुए उसे संवाद, बहुलता और पुनर्रचनात्मकता की जीवंत परंपरा के रूप में समझने का प्रयास करता है। भारतीय ज्ञान परंपरा बहुभाषिक, बहुसांस्कृतिक और बहुकेंद्रिक रही है, जिसमें शास्त्र और लोक, प्राचीन और आधुनिक, परंपरा और नवाचार के बीच निरंतर संवाद बना रहा है। रामकथा की विविध पुनर्रचनाएँ, भक्ति आंदोलन की समतामूलक चेतना, तथा आधुनिक काल में गांधी, प्रेमचंद और निराला जैसे चिंतकों का हस्तक्षेप इस परंपरा की गतिशीलता को स्पष्ट करता है। यह परंपरा ज्ञान को वर्चस्व का उपकरण नहीं, बल्कि विवेक, संवेदना और नैतिक समन्वय का माध्यम मानती है। समकालीन सूचना-प्रधान समाज में, जहाँ ज्ञान को सूचना में समेट दिया गया है, भारतीय ज्ञान परंपरा आलोचनात्मक दृष्टि, अनुभव की स्वतंत्रता और मानवीय समता का वैकल्पिक मार्ग प्रस्तुत करती है। शोधपत्र यह प्रतिपादित करता है कि भारतीय ज्ञान परंपरा मूलतः संघर्ष और संवाद की परंपरा है, जो सत्ता के बजाय मनुष्यता और साझेदारी को केंद्र में रखती है।
Keywords
भारतीय ज्ञान परंपरा, सत्ता और वर्चस्व, बहुलता, संवाद, पुनर्रचनात्मकता, लोक और शास्त्र, भक्ति परंपरा, ज्ञान बनाम सूचना, समन्वय, मानवतावाद