Abstract
International Journal of Advance Research in Multidisciplinary, 2026;4(1):133-141
मुग़लों की दक्षिण नीति-अकबर से औरंगजेब तक (1590-1707)
Author : अमर कुमार भारती, हिमांशु कुर्रे
Abstract
दक्षिण भारत पर प्रभुत्व स्थापित करने की आकांक्षा भारतीय शासकों में प्राचीन काल से ही रही है, जिसका प्रारंभ मौर्य काल में चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक के समय से माना जाता है । गुप्त शासक समुद्रगुप्त द्वारा प्रतिपादित ग्रहण-मोक्ष-अनुग्रह की सामरिक परंपरा का मध्यकाल में अलाउद्दीन खिलजी ने कुशलतापूर्वक अनुसरण किया, जिसका उद्देश्य भौगोलिक विस्तार के स्थान पर दक्षिण से वार्षिक कर और अकूत संपदा प्राप्त करना था । वहीं गियासुद्दीन तुगलक, मोहम्मद बिन तुगलक जैसे शासकों ने प्रत्यक्ष तौर पर दक्षिण में साम्राज्य विस्तार और विलय का मार्ग चुना । गियासुद्दीन और विशेषकर मुहम्मद बिन तुगलक के काल में, अप्रत्यक्ष नियंत्रण के स्थान पर प्रत्यक्ष नियंत्रण हेतु सैन्य कार्यवाही की प्रक्रिया प्रारंभ हुई, जिसके परिणामस्वरूप 1323 ई. में वारंगल का पूर्ण प्रशासनिक एकीकरण कर दिया गया । इसी कालखंड में 1336 ई. में हरिहर और बुक्का नामक दो भाइयों ने विजयनगर साम्राज्य की नींव रखी, जिसकी राजधानी हम्पी थी । इसके कुछ समय पश्चात, 1347 ई. में अलाउद्दीन बहमन शाह के नेतृत्व में बहमनी राज्य की स्थापना हुई । इन दोनों राज्यों के बीच रायचूर दोआब को लेकर लंबे समय तक संघर्ष चला । इसी क्रम में बहमनी साम्राज्य 1518 ई. तक पाँच स्वतंत्र सल्तनतों में विभाजित होकर मुगलकालीन राजनीति के लिए सामरिक आकर्षण और निरंतर संघर्ष का केंद्र बन गई । दिल्ली सल्तनत के शासकों की राज्य विस्तार की नीति और दक्षिण भारत में इस्लामिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार ने स्थानीय स्तर पर छोटे-छोटे विद्रोहों को जन्म दिया ।
मुगल साम्राज्य के लिए दक्षिण भारत का अभियान राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से एक तरह केंद्रीय रणनीति का हिस्सा रहा । जहाँ बाबर और हुमायूँ का ध्यान मुख्य रूप से उत्तर भारत तक सीमित रहा उन्होंने दक्षिण भारत की ओर उतना ध्यान नहीं दिया । अकबर, शाहजहां एवं औरंगजेब ने दक्कन की अपार संपदा और उत्तर भारत में स्थिरता के कारण इन अभियानों को प्राथमिकता दी । इस क्रम में अकबर ने साम्राज्य विस्तार और पुर्तगालियों के प्रभाव को संतुलित करने के लिए दक्षिण की ओर कदम बढ़ाए । अकबर ने खानदेश और असीरगढ़ (1601 ई.) की विजय से दक्षिण में प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित करने की नींव रखी, जिसे जहांगीर ने कूटनीति और संधियों के जरिए आगे बढ़ाया । शाहजहाँ के शासनकाल में दक्षिण नीति पुनः आक्रामक हुई और 1632-33 ई. में अहमदनगर को पूरी तरह मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया । विशेष रूप से औरंगजेब का काल दक्कन क्षेत्र में मराठों, बीजापुर, गोलकुंडा और अन्य क्षेत्रीय सल्तनतों के साथ संघर्ष का विषय बना रहा । अंततः जिस दक्षिण नीति को साम्राज्य के सुदृढ़ीकरण के लिए अपनाया गया था, वही अत्यधिक केंद्रीकरण और सैन्य क्षरण के कारण मुगल साम्राज्य के पतन का एक मुख्य कारण सिद्ध हुई । औरंगजेब ने अपने शासनकाल का एक बड़ा हिस्सा दक्कन के युद्धों में झोंक दिया, जिसका मुख्य उद्देश्य मराठों का दमन और बीजापुर व गोलकुंडा जैसी सल्तनतों का नाश कर अपने साम्राज्य में शामिल करना था । निष्कर्षतः दक्कन का यह अंतहीन संघर्ष 'दक्कन के नासूर' के रूप में परिणत हुआ, जिसने अंततः मुगल साम्राज्य के पतन की नींव रखी ।" इस प्रकार देख सकते हैं कि अकबर एवं जहांगीर की नीति अधिक आक्रामक नहीं थी परन्तु, शाहजहां और विशेषकर औरंगजेब के काल में यह नीति पूर्ण सैन्य विलय और वर्चस्व में बदल गई।
Keywords
मुग़ल साम्राज्य, दक्षिण नीति, औरंगजेब, सांस्कृतिक विस्थापन, मराठा संघर्ष, साम्राज्यवादी विस्तार, बीजापुर-गोलकुंडा विलय, दक्कन का नासूर ।