Email : editor.ijarmjournals@gmail.com

ISSN : 2583-9667, Impact Factor: 6.49

Contact : +91 7053938407

Email editor.ijarmjournals@gmail.com

Contact : +91 7053938407

Abstract

International Journal of Advance Research in Multidisciplinary, 2023;1(1):1041-1045

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का प्रजातांत्रिक दर्शन: एक वैचारिक पुनरावलोकन

Author : श्री प्रभाकर

Abstract

प्रस्तुत शोध पत्र पंडित दीनदयाल उपाध्याय के राजनीतिक चिंतन के उस पक्ष को उद्घाटित करता है, जिसे उन्होंने 'लोकतंत्र के भारतीयकरण' की संज्ञा दी थी। उपाध्याय जी का मानना था कि स्वतंत्रता के उपरांत भारत ने जिस लोकतांत्रिक ढांचे को स्वीकार किया, वह काफी हद तक पश्चिमी नकल था और भारतीय जनमानस की 'चिति' (आत्मा) से मेल नहीं खाता था। उन्होंने तर्क दिया कि लोकतंत्र केवल संख्याबल का खेल नहीं, बल्कि एक ऐसी जीवन-पद्धति है जो 'धर्म' (नैतिक मर्यादा) और 'अंत्योदय' (अंतिम व्यक्ति का उत्थान) पर टिकी होनी चाहिए। यह लेख उनके द्वारा प्रतिपादित 'लोकमत-परिष्कार' और सहभागी शासन की दार्शनिक प्रासंगिकता का विश्लेषण करता है, जो आज के चुनावी दौर में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

Keywords

प्रजातांत्रिक दर्शन, एकात्म मानववाद, लोकमत-परिष्कार, अंत्योदय, धर्म-राज्य, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, वैचारिक सहिष्णुता, निर्वाचकीय शुद्धि, भारतीय चिति, दलीय शुचिता, नागरिक चेतना, वैधानिक निष्ठा, सत्ता-अनासक्ति, स्वदेशी जनतंत्र।