Article Abstract
International Journal of Advance Research in Multidisciplinary, 2026;4(1):09-12
भौतिक शिक्षा और आध्यात्मिक शिक्षा का तुलनात्मक अध्ययन वर्तमान परिपेक्ष में।
Author : रानी खुशबू कुमारी
Abstract
वर्तमान भौतिक जगत में जीवन का सर्वेेच्च सफलता का अर्थ केवल धन अर्जन करना रह गया है। शिक्षा केवल व्यवसाय के लिए ग्रहण किया जाता है। इस समय देखा जाए तो प्रायः प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी सकाम कर्म में लगा हुआ है। जो लोग कर्म करके भौतिक लाभ लेना चाहते हैं, वे कर्मी कहे जाते हैं। जो आगे बढ़ने की दौड़ में यह भी सोच पाते की ’’प्रकृति के नियम’’ का क्या होगा। कौन से दष्कर्म के लिए क्या भुगतना पड़ता है।
आध्यात्मिक जगत भगवान की सम्पूर्ण सृष्टि के तीन चैथाई भाग में फैला है और यह अत्यन्त पूज्यनिय क्षेत्र है। आध्यात्मिक जगत स्वभावतः भौतिक जगत से श्रेष्ठ है, इसलिए आध्यात्मिक शिक्षा भी भौतिक शिक्षा से श्रेष्ठ है। आध्यात्मिक शिक्षा के महत्व को समझने वाले व्यक्ति ही भौतिक प्रकृति के सही उपयोग को समझ सकेंगे। इस भौतिक जगत में जब कोई मनुष्य आध्यात्म की अपेक्षा भौतिक जीवन शैली में अधिक रुचि लेता है तो वह रुग्ण समझा जाता है। जब व्यक्ति भौतिक जगत के बाह्य गुणों से आकर्षित होकर यह भूल जाता है कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है? वही माया का संसार दुराश्रय कहलाता है जिसका अर्थ है‘‘ मिथ्या या बुरी शरण’’ जो दुराश्रय में श्रद्धा रखता है उसे दुराशा ही प्राप्त होती है। इस भौतिक शिक्षा से प्रत्येक व्यक्ति सुखी रहने का प्रयास करता है और उसके प्रयास सभी तरह से विफल होते हैं, किन्तु अविधा के कारण वह अपनी त्रुटियों को नहीं समझ पाता। इस जगत में लोग एक ऋुटि को दूसरी त्रुटि से सुधारना चाहते हैं। इस जीवन में जीवन-संघर्ष की यही रीति है।
शोध सारांश में स्पष्ट रुप से यह सीखाने का प्रयास किया है, कि यह शोध आपके शरीर की इम्यूनिटि बढ़ाये न बढ़ाये परंतु आपके आत्मा की इम्यूनिटि जरुर बढ़ायेगी। वैसे छात्र जिनका रैंक प्रथम नहीं आने पर आत्म हत्या कर लेते हैं। उनमें सुधार होगी।
Keywords
पारंपरिक वैदिक शिक्षा, इस्काॅन सोसाइटी, वैराग्य (वैराग्य का अर्थ है-पदार्थ से विरक्ति और मन का आत्मा में प्रवृŸा होना)