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ISSN : 2583-9667, Impact Factor: 6.49

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Article Abstract

International Journal of Advance Research in Multidisciplinary, 2024;2(3):689-694

डॉ. बी. आर. अंबेडकर का सामाजिक न्याय दर्शन: दलित अस्मिता एवं लैंगिक समानता का एकीकृत विश्लेषण

Author : श्री प्रभाकर

Abstract

आधुनिक भारतीय राजनीतिक एवं सामाजिक चिंतन के क्षितिज पर डॉ. भीमराव अंबेडकर एक ऐसे युगांतरकारी महापुरुष के रूप में स्थापित हैं, जिनके विचार समय की सीमाओं को लांघकर सदैव प्रासंगिक बने हुए हैं। डॉ. अंबेडकर का दर्शन मात्र किताबी सिद्धांतों का संकलन नहीं है, बल्कि यह करोड़ों वंचितों, शोषितों और हाशिए पर धकेल दिए गए मनुष्यों के 'अस्तित्व' और 'अस्मिता' की पुनर्खोज का महाकाव्य है। इस शोध पत्र का मुख्य केंद्र बिंदु डॉ. भीमराव अंबेडकर के सामाजिक दर्शन का वह पक्ष है, जो दलितों के राजनीतिक उत्थान और महिलाओं के वैधानिक सशक्तिकरण के मध्य एक सेतु का कार्य करता है। इस शोध का सार यह है कि डॉ. अंबेडकर ने समाज के इन दोनों वर्गों को एक ही 'अन्याय के धरातल' पर खड़ा पाया और उनके समाधान के लिए 'संवैधानिक नैतिकता' को एकमात्र विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया। शोध इस तथ्य का विश्लेषण करता है कि डॉ. अंबेडकर का 'नारीवाद' समकालीन पाश्चात्य नारीवाद से कहीं अधिक समावेशी और यथार्थवादी था, क्योंकि वह केवल उच्च वर्ग की महिलाओं की बात नहीं करता था, बल्कि वह खेत में काम करने वाली दलित महिला और कारखानों में पसीना बहाने वाली श्रमिक महिला के अधिकारों की भी पुरजोर वकालत करता था।

शोध का एक महत्वपूर्ण हिस्सा डॉ. अंबेडकर द्वारा रचित 'हिंदू कोड बिल' के क्रांतिकारी स्वरूप पर प्रकाश डालता है। यह बिल केवल एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं था, बल्कि भारतीय समाज की पुरुष प्रधान मानसिकता पर किया गया सबसे बड़ा प्रहार था। शोध यह स्पष्ट करता है कि किस प्रकार डॉ. अंबेडकर ने उत्तराधिकार, विवाह और गोद लेने जैसे विषयों में आमूलचूल परिवर्तन का प्रस्ताव देकर महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक रूप से स्वावलंबी बनाने का मार्ग प्रशस्त किया। यद्यपि उस समय के रूढ़िवादी तत्वों ने इसका कड़ा विरोध किया, जिसके कारण बाबासाहेब ने अपने पद से इस्तीफा तक दे दिया, किंतु उनकी इसी त्यागपूर्ण प्रतिबद्धता ने भविष्य के 'हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 2005' जैसे कानूनों के लिए ज़मीन तैयार की। इसके अतिरिक्त, यह शोध 'दलित अस्मिता' के उस राजनीतिक रूपांतरण की समीक्षा करता है, जो 'बहिष्कृत हितकारिणी सभा' से प्रारंभ होकर 'स्वतंत्र लेबर पार्टी' और अंततः भारतीय संविधान के 'आरक्षण' प्रावधानों तक पहुँचता है। शोध यह सिद्ध करता है कि अंबेडकर ने दलितों को 'प्रार्थना करने वाले' वर्ग से बदलकर 'प्रश्न करने वाले' वर्ग में परिवर्तित कर दिया। उन्होंने यह चेतना जागृत की कि मंदिर प्रवेश से अधिक महत्वपूर्ण 'संसद प्रवेश' है।

संक्षेप में, यह शोध पत्र डॉ. अंबेडकर के जीवन के उन महत्वपूर्ण पड़ावों को समाहित करता है-जैसे महाड़ सत्याग्रह, गोलमेज सम्मेलन में उनका तर्कपूर्ण पक्ष, और संविधान निर्माण में उनके द्वारा शामिल किए गए मौलिक अधिकार-जो सामूहिक रूप से एक 'न्यायपूर्ण भारत' की तस्वीर पेश करते हैं। शोध का निष्कर्ष यह है कि अंबेडकरवादी विचारधारा आज के दौर में और भी अधिक प्रासंगिक है, क्योंकि यह समाज के सबसे दुर्बल व्यक्ति को भी अपनी आवाज़ उठाने का संवैधानिक साहस प्रदान करती है। यह केवल एक अतीत का अध्ययन नहीं है, बल्कि भविष्य के समावेशी भारत का एक मार्गदर्शक दस्तावेज़ है।

Keywords

न्याय, दलित अस्मिता, नारीवादी विमर्श, हिंदू कोड बिल, संवैधानिक नैतिकता, समतामूलक समाज, पितृसत्तात्मक संरचना, वैधानिकसुधार, लिंगिकसमानता।