Article Abstract
International Journal of Advance Research in Multidisciplinary, 2026;4(1):228-230
विमुद्रीकरण एवं देश के आर्थिक विकास
Author : कृष्णा कुमारी
Abstract
विमुद्रीकरण के मूल्याकन अध्ययन से यह ज्ञात हुआ है कि विमुद्रीकरण ने भारत की सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था को सकारात्मक रूप से ही नही अपितु नकारात्मक रूप से भी प्रभावित किया है भारत में कुल जनसंख्या के लगभग 70 फीसदी जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्र में निवास करती है। अतः यह कहना उचित होगा कि शहरी क्षेत्रो की अपेक्षा ग्रामीण परिवेश विमुद्रीकरण से अत्यधिक प्रभावित हुआ है । चुकीं विमुद्रीकरण नगदी से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित है, अतः कहा जा सकता है कि ग्रामीण परिवेश में अर्थिक क्षेत्र के साथ- साथ सास्कृतिक, सामाजिक तथा राजनीतिक क्षेत्र भी प्रभावित हुआ है। क्योकि ग्रामीण लोग अधिकांश कार्य नगद में करते है। विमुद्रीकरण से देश में ग्रामीण मजदूर वर्ग के रोजगार विहिन रहने, छोटे छोटे व्यवसायो के ठप होने तथा सामाजिक कार्यक्रमों के बाधित होने जैसे कई प्रभाव हुए है। विमुद्रीकरण का निर्णय सरकार सरकार की एक सकारात्मक सोच का प्रदर्शन करता है परन्तु इसके साथ साथ सरकार को नोटो की मांग के अनुसार पूर्ति, कमजोर व सीमित बैकिंग ढाचें को दूरस्त करना तथा बैकों में कार्यस्थल पर भ्रष्टाचार को रोकना आदि उपाय साथ साथ में किए जाने चाहिए थे। साथ ही ग्रामीण लोगो के लिए विशेषतः किसानो को फसलो की बिक्री पर न्यूनतम समर्थन मूल्य के अतिरिक्त बोनस भी दिए जाने, किसान क्रेडिट कार्ड के तहत वितरित ऋण पर ब्याज वसूली में छूट दिए जाने, मनरेगा के कार्य दिवसो में वृद्धि करने तथा सम्भावित अतिरिक्त कर सग्रंह से सामाजिक कल्याण की नई योजना शुरू करने जैसे उपाय भी करना आवश्यक है जिससे कि विमुद्रीकरण से होने वाली कठिनाइयों को कम किया जा सकता अथवा समाप्त किया जा सकता है विमुद्रीकरण अर्थव्यवस्था में सुधार, पारदर्शिता, कालाधन की समाप्ति, आतकंवाद पर रोक तथा जाली नोटो को निष्क्रिय करने की सरकार की एक अनुठी पहल है।
Keywords
सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था, सकारात्मक, नकारात्मक, ग्रामीण परिवेश, सामाजिक कल्याण, पारदर्शिता, कालाधन