Article Abstract
International Journal of Advance Research in Multidisciplinary, 2026;4(3):76-78
आदिवासी अस्तित्व की संघर्षगाथा ‘मरंग घोड़ा नीलकंठ हुआ’
Author : डॉ. नेहा सिंह
Abstract
प्रस्तुत शोध आलेख में आदिवासी जीवन,प्रकृति के साथ उनके सहसंबंध तथा विकास एवं औद्योगीकरण के कारण उत्पन्न विस्थापन व पर्यावरणीय संकट का बहुत ही सहज एवं मार्मिक विश्लेषण किया गया है।आदिवासी समाज के लिए प्रकृति केवल जीवन निर्वाह का साधन नहीं अपितु उनके अस्तित्व के लिए साध्य है। किंतु उत्तराधुनिकता की इस दौड़ में अत्यधिक खनन, विकास के नाम पर जंगल की कटाई ने जनजाति अस्तित्व को संकट में डाल दिया है, ‘मरंग घोड़ा नीलकंठ हुआ’ उपन्यास के संदर्भ में यूरेनियम खनन से उत्पन्न रेडियो धर्मी प्रदूषण, विस्थापन, स्वास्थ्य संबंधी विभिन्न समस्याओं तथा उनके सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को चित्रित किया गया है इस उपन्यास में मरंग घोड़ा के आदिवासियों के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि विकास की असली कीमत प्रायः प्रकृति पर निर्भर इन आदिवासी समाज की चुकानी पड़ती है, यूरेनियम के खनन से उत्पन्न खतरनाक विकिरण से जल, जंगल, ज़मीन,वायु तो प्रदूषित हुई ही साथ ही इन वंचित लोगों को कैंसर,विकलांगता,बांझपन,कुपोषण जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से भी जूझना पड़ता है।इसके अतिरिक्त यूरेनियम से निर्मित परमाणु ऊर्जा से स्वयं को सशक्त मानने वाले देशों के लिए भी यह उपन्यास एक प्रश्न चिह्न खड़ा करता है कि कुछ वंचित समूहों के जीवन के बदले किया यह विकास क्या वास्तविक विकास है? साथ ही इस उपन्यास में प्रकृति एवं मनुष्य के बीच तारतम्यता व संतुलन बनाये रखने का संदेश भी दिया गया है जिससे सम्पूर्ण मानवता संकटग्रस्त न हो।
Keywords
आदिवासी समाज, विस्थापन, यूरेनियम खनन, रेडियोधर्मी प्रदूषण