Article Abstract
International Journal of Advance Research in Multidisciplinary, 2026;4(1):425-426
भारतीय ज्ञान परंपरा और हिंदी नवगीत
Author : डॉ. संतोष कुमार सिंह
Abstract
भारतीय ज्ञान परंपरा में लय, नाद और छंद को केवल काव्य-सौंदर्य का उपकरण नहीं, बल्कि जीवन, चेतना और सृष्टि की मूल संरचना माना गया है। वेदों की ऋचाएँ, सामवेद की गेय परंपरा, नाट्यशास्त्र की रस-सिद्धि और छंदःशास्त्र की व्यवस्था इस तथ्य को प्रमाणित करती हैं कि भारतीय साहित्य की चेतना मूलतः लयात्मक रही है। हिंदी कविता की गीत-परंपरा इसी सांस्कृतिक स्मृति की उत्तराधिकारी है, जो आधुनिक काल में नवगीत के रूप में विकसित होती है। प्रस्तुत शोधपत्र का उद्देश्य हिंदी नवगीत को भारतीय ज्ञान परंपरा के आलोक में समझना तथा उसकी लयात्मक, सामाजिक और सांस्कृतिक अर्थवत्ता का विश्लेषण करना है। अध्ययन में ठाकुर प्रसाद सिंह से लेकर शम्भूनाथ, नईम, सोम ठाकुर, देवेन्द्र कुमार ‘मुनिवर’, केदारनाथ सिंह, उमा कांत मालवीय और हरिवंश राय बच्चन तक की नवगीत-परंपरा का आलोचनात्मक विवेचन किया गया है। नवगीत में लोक, प्रकृति, श्रम, प्रेम, परिवार, किसान और स्त्री जैसे सामाजिक सरोकार लयात्मक संवेदना के साथ अभिव्यक्त होते हैं।शोधपत्र यह भी स्पष्ट करता है कि मुक्तछंद की व्यापक स्वीकृति के बावजूद कविता से लय का पूर्ण विच्छेद संभव नहीं हुआ है। दुष्यंत कुमार, जगदीश गुप्त और अन्य आलोचकों की चिंताओं के संदर्भ में यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया गया है कि नवगीत समकालीन कविता को स्मरणीयता, संप्रेषणीयता और सामाजिक सम्बल प्रदान करता है। निष्कर्षतः हिंदी नवगीत को भारतीय ज्ञान परंपरा की एक जीवंत, आधुनिक और सांस्कृतिक निरंतरता के रूप में देखा जा सकता है।
Keywords
भारतीय ज्ञान परंपरा, नवगीत, लय और नाद, सामवेद, गीत-परंपरा, लोक-संवेदना, सामाजिक यथार्थ, हिंदी कविता